Saturday, 10 February 2018

भाग -1

   खण्ड 6
                    पाप स्वीकार 
           पाप स्वीकार क्या है ?
      पाप स्वीकार में दो विषय है-पहला पाप मान लेना, दूसरा पुरोहित से ऐसे पाप क्षमा ग्रहण करना ,जैसे ईश्वर से ही पाप पापमोक्षण प्राप्त हुआ ।

         किन-किन पापों को स्वीकार करना चाहिये ?
  ईश्वर के सामने अपने को वरन् सब अज्ञात पापों को भी दोषी जानना चाहिए । हम प्रभु की प्रार्थना में कहते हैं, तथापि पुरोहित के सामने हमें केवल उन पापों को मान लेना उचित है, जो हम जानते और मन में अनुभव करते हैं  ।

         वे कौन-कौन हैं ?
    दस आज्ञाओं के अनुसार अपने जीवन की दशा परखें  । चाहे तू माता-पिता , पुत्र-पुत्री;  स्वामी, घरनी, दास हो, चाहे तू अनाज्ञाकारी, अविश्वस्त,आलसी हुआ हो, चाहे तूने वचन अथवा कर्म से किसी को दुःख दिया हो , चाहे किसी    की चोरी अथवा आलस और ढिलाई से हानी की हो ।
        कुंजिओं का अधिकार क्या है ? 
  यह मंडली का अद्भुत अधिकार है जिसको ख्रिस्त ने पृथ्वी पर की कलीसिया को दिया है की वह पापियों के पापों को क्षमा करे, परन्तु अपश्चतापियों के पापों को तब तक रख छोडे जब तक की वे पश्चताप ना करें  ।

        यह कहाँ लिखा है ?
    युहन्ना अपने मंगल समाचार के २०वे पर्ब के 22 वे पद में यों लिखता है की - "प्रभु यीशु ने फूंक दिया और अपने शिष्यों से कहा, पवित्र आत्मा लो, जिसके पाप तुम क्षमा करो वे उनके लिए क्षमा किये जाते हैं जिनके तुम रखो वे     रखे हुए हैं ।"

      इस वचन को सुनकर तुम क्या विश्वास करते हो ?

   हम विश्वास करते हैं की जब ख्रिस्त के बुलाए गए सेवक उसकी ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार हमसे जो व्यवहार करते हैं, विशेषकर जब वे खुले रूप से अपश्चतापि पापियों ( चाहे वह आम व्यक्ती हो अथवा पुरोहित) को ख्रिस्तीय  मंडली से निकलते और उनको अलग करते हैं और उन पश्चतापियों को उनके पापों से मुक्त करते हैं जो पश्चाताप कर सुधारना चाहते हैं; तो यह उचित और निर्विवाद है, मानों हमारा प्रिय प्रभु यीशु स्वंय ही हमसे ऐसा करता है  ।

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