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Saturday, 10 February 2018

भाग -1


    खण्ड 1 
     दस आज्ञा 
        पहली आज्ञा
  परमेश्वर तेरा ईश्वर मैं हूँ किसी दुसरे को ईश्वर मत मान ।
       इसका क्या अर्थ है ?
  हम सब वस्तुओं से अधिक ईश्वर का भय, प्रेम और भरोसा रखें ।

       दूसरी आज्ञा 
  किसी प्रकार की मूर्ति पूजा मत कर ।
     इसका क्या अर्थ है ?
  हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें ।
  हम किसी बनाई हुई वस्तु की पूजा- सेवा न करें ,न उसका नाम लें न उसके सामने झुकें ।
   कयोंकि ईश्वर आत्मा है और अवश्य है, की उसके भजन करने वाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें ।
 
        तीसरी आज्ञा 
  परमेश्वर अपने ईश्वर का नाम अकारथ मत ले, कयोंकि ईश्वर, उसको जो उसका नाम अकारथ लेता है, निर्दोषी न ठहराएगा  । 
       इसका क्या अर्थ है ?
        हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
   हम उसके नाम से श्राप ना दें,  न किरिया खाएं, न टोना ओझाई करें ,न झूठ बोलें ,न ठगें  ।
       परन्तु सब बिपत्तिओं में उसकी दुहाई, बिन्ती, स्तुति और धन्यवाद करें  ।
 
       चौथी आज्ञा 
    बिश्रामवार को पवित्र रखने के लिए मत भूल  । 
       इसका क्या अर्थ है ?
     हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
    हम उसका वचन और धर्मोपदेश को तुच्छ न करें , परन्तु पवित्र मानकर आनंद से सुने और सीखें  ।
   
   
      पांचवीं आज्ञा 
  अपने माता-पिता का आदर कर, जिससे तेरा भला हो और पृथ्वी पर तेरा जीवन अधिक हो  । 
        इसका क्या अर्थ है ? 
        हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
    हम अपने माता-पिता और स्वामियों का अपमान ना करें, न ही उनको क्रोधित करें  ।
      परन्तु उनका सम्मान और सेवा करें , आज्ञा मानें और उनको प्यार करें  ।

       छठवीं आज्ञा 
     मनुष्य हत्या मत कर  । 
       इसका क्या अर्थ है ? 
    हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
    हम अपने पड़ोसी की देह और प्राण को किसी प्रकार की हानि और दुःख ना पहुँचाएँ , परन्तु देह और प्राण की बिपत्ति में उसकी सहायता और भलाई करें  ।
 
       सातवीं आज्ञा 
     व्याभिचार मत कर  । 
     इसका क्या अर्थ है ?
   हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
   हम अपने मन, वचन और कर्म में शुद्ध और संयमी होकर जीवन बिताएं और हरएक स्त्री-पुरुष , परस्पर प्रेम और आदर करें  ।
 
       आठवीं आज्ञा 
       चोरी मत कर  । 
      इसका क्या अर्थ है ?
   हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
   हम अपने पड़ोसी का धन-सम्पत्ति न छिन्नें ,ना छल कपट से अथवा अनैतिक रूप से उसकी सम्पत्ति को अपनाकर भ्रष्ट बने ,परन्तु उसके धन-सम्पत्ति और जीविका की वृद्धि और रक्षा में सहायता करें  ।
         नौवीं आज्ञा 
     अपने पडोसी पर झूठी साक्षी मत दे  । 
     इसका क्या अर्थ है ? 
    हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
   हम अपने पडोसी से झूठ ना बोलें, ना उसका भेद खोलें ना चुगली, ना मिथ्या अपवाद करें, परन्तु जहाँ तक बन पड़े उसका पक्ष लें, उसका आदर आदर करें और यत्न से उसको भला ठहराएं  ।

          दसवीं  आज्ञा 
  अपने पड़ोसी के घर और उसके परिवार का लालच मत कर  ।
        इसका क्या अर्थ है ?
   हम ईश्वर का भय और प्रेम रखें  ।
   हम अपने पड़ोसी के घर द्वार , खेत और मवेशियों पर लोभ की दृष्टी ना रखें, ना बहाना करके उनको अपनाएं ना उसकी स्त्री , दास- दासी को फुसलाएं  या बिगाड़ें , परन्तु यत्न करें की जो कुछ
उसका है, कुशल से उसके पास रहे और उसके कम आये  ।
                   ईश्वर इन सब आज्ञाओं के विषय में क्या कहता है ?
   ईश्वर यों कहता है, की मैं परमेश्वर तेरा प्रभु ज्वलित ईश्वर हूँ ।मैं पुर्बजों के अपराध का दण्ड , उनके पुत्रों को, जो मुझ से बैर रखते हैं, उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देता हूँ  । परन्तु सहस्रों , पर
    जो मुझे प्यार करते और मेरी आज्ञाओं का पालन करते हैं, मैं दया करता हूँ  ।
                             इसका क्या अर्थ है ? 
    ईश्वर उन सभों को दण्ड देने के लिए धमकता है, जो उसकी आज्ञाओं का उलंघन करते हैं , इसलिए हम ईश्वर के क्रोध से डरें और उसकी आज्ञाओं का बिरोध ना करें  ।
   फिर वह अपने अनुग्रह और सारी भलाई की प्रतिज्ञा उन सभों को देता है, जो इन आज्ञाओं को मानते हैं, इसलिए हम उसको प्यार भी करें, उस पर भरोसा  रखें और आनंद से उसकी आज्ञाओं का पालन करें  ।

भाग -1

                    खण्ड -2
            प्रेरितों का विश्वास दर्पण  
                      पहला भाग 
                  सृष्टी के विषय में 

 मैं विश्वास करता हूँ, परमेश्वर पिता पर , जो स्वर्ग और पृथ्वी का सर्वशक्तिमान सिरजनहार है  ।
         इसका क्या अर्थ है ? 
    मैं मानता हूँ , की ईश्वर ने मुझे और सब सृष्टी को सृजा । वह मुझे देह और प्राण, आंख-कान और सब चैतन्य  और सब इन्द्रियाँ  देकर अब तक पालन करता है  ।
     इसके अतिरिक्त मुझे ओढना ,बिछौना ,खाना-पीना , घर- बार ,स्त्री , बच्चे, खेत-मवेशी और सब संपत्ति , देह और प्राण के सब आवश्यक पदार्थ और आहार बहुताई से प्रतिदिन पहुंचाता है । वह जोखिमों से बचाता और सब आपद से रक्षा करता है ।
 यह सब मेरे गुण और योग्यता से नहीं परन्तु ईश्वर स्वयं अपनी निरी पैतृक ईश्वयीय भलाई और दया से करता है  ।
    तो अवश्य  है , की मैं उसका धन्यवाद और प्रशंसा करूँ, उनका सेवक और आज्ञाकारी बना रहूँ  । यह नि:संदेह सत्य है  ।
   
          दुसरा भाग 
          त्राण के विषय में 
       और उसके एकलौते पुत्र , अपने प्रभु यीशु ख्रिस्त पर,जो पवित्र आत्मा से गर्भ में आया ,कुँवारी मरियम से उत्पन हुआ, पंतियुस पिलातुस की आज्ञा से दुःख उठाया , क्रूस पर चढ़ाया गया ,मर गया और गाडा गया, पाताल में उतरा , तीसरे दिन मृतकों में से जी उठा , स्वर्ग पर चढ़ गया और परमेश्वर सर्वशक्तिमान पिता के दाहिने हाथ बैठा है , जहाँ से वह जीवतों और मृतकों का विचार करने को फिर आयेगा ।
                                             इसका क्या अर्थ है ?
    मैं मानता हूँ की यीशु ख्रिस्त मेरा प्रभु है । जो सच्चा ईश्वर होकर अनादि काल से पिता से उत्पत्र और सच्चा मनुष्य भी होकर कुँवारी मरियम से उत्पन्न हुआ  ।
              उसने मुझे खोए श्रापित मनुष्य का उद्धार किया और मुझे सब पाप , मृत्यु और शैतान के अधिकार से बचाया  ।
     उसने सोने और रुपे से नहीं परन्तु अपने पवित्र अनमोल लोहू और अपने निर्दोष कठिन दुःख-भोग और मृत्यु के द्वारा मुझे बचाया , की मैं उसी का होऊँ , उसके  अधीन होकर उसके राज्य में जिऊँ और अनंत धर्म-परायणता , निर्दोषता और ईश्वरीय कृपा में उसकी सेवा करूँ कयोंकि जैसे वह मृतकों में से जी उठा और सदालों जीता और राज्य करता है । यह नि:संदेह सत्य है ।


         तीसरा भाग 
       पवित्रीकरण के विषय में 
    मैं विश्वास करता/करती हूँ , पवित्र आत्मा पर, एक ही पवित्र ख्रिस्तानी कलीसिया , पवित्रों की संगत पर, पापों की क्षमा , देह के जी उठने और अनन्त जीवन पर, आमीन ।
                         इसका क्या अर्थ है ?
      मैं मानता/मानती हूँ की मैं अपनी चेतना और शक्ति से अपने प्रभु यीशु ख्रीस्त पर किसी प्रकार न तो विश्वास कर सकता , न उसके पास पहुँच सकता/सकती हूँ  ।
     परन्तु पवित्र आत्मा ने मुझे मंगल समाचार के द्वारा बुलाया, अपने दानों से प्रकाशमय और सच्चे विश्वास में पवित्र और स्थिर किया । जैसे वह पृथ्वी पर सम्पूर्ण ख्रिस्तानी मंडली को बुलाता, बटोरता , प्रकाशमय
और पवित्र करता है और यीशु ख्रिस्त में एकही सच विश्वास के द्वारा स्थिर करता रहता है, इसी कलीसिया में वह प्रतिदिन मेरे और सब विश्वासियों के सारे पाप अनुग्रह से क्षमा करता है , और हम सभों को महाविचार के दिन मृतकों में से जिला उठाएगा और मुझे और सब ख्रिस्त विश्वासियों को अनन्त जीवन देगा , यह नि:संदेह सत्य है  ।

भाग -1

          खण्ड -3
       प्रभु की प्रार्थना  
     हे हमारे पिता ,तू जो स्वर्ग में है । 
          इसका क्या अर्थ है ? 
  इस प्रवेशन के द्वारा ईश्वर प्रेम से हमको प्रेरित करता है , की हम निश्चय विश्वास करें , की वह हमरा सच्चा पिता है और हम उसकी सच्ची संतान हैं ।
         जिसमे हम भरोसा और साहस के साथ उससे निबदन करें जैसे प्रिये बच्चे कुछ संदेह न करके अपने माता-पिता से किसी बात का निबेदन करते हैं ।
                       
                   पहली बिनती 
             तेरा नाम पवित्र किया जाए ।
 
         इसका क्या अर्थ है ?
    ईश्वर का नाम तो आप ही पवित्र है, परन्तु हम इस बिनती में मांगते हैं , की वह हमारे बीच में पवित्र किया जाए ।
        यह कैसे होता है ?
जब ईश्वर का वचन निर्मल और निष्कपट रीती से सिखाया जाता है और हम ईश्वर के संतानों के समान उसके अनुसार धार्मिकता से जीते हैं  । हे प्रिय , स्वर्गवासी पिता हमारी सहायता कर कि ऐसा ही हो ।
  परन्तु जो ईश्वर के वचन को भित्र सिखाते और जीते हैं , वे हमारे बीच में ईश्वर के नाम को अपवित्र करते हैं, हे स्वर्गवासी पिता, उनसे हमको बचा ।
                       
                दूसरी बिनती 
                   तेरा राज्य आए । 
  ईश्वर का राज्य हमारे निबेदन के बिना आप से तो आता है परन्तु हम इस बिनती में मांगते हैं कि वह हमारे पास भी पहुंचे ।
                              यह कैसे होता है ?
 जब स्वर्गवासी पिता हमको अपना पवित्र आत्मा देता है , कि हम उसके अनुग्रह के द्वारा उसके पवित्र वचन पर विश्वास करें और जैसे इस काल में, वैसे ही अनंत कल में पवित्रता से जियें ।

               तीसरी  बिनती 
            तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में वैसे पृथ्वी पर भी हो ।
                  इसका क्या अर्थ है ? 
 ईश्वर की उत्तम और करुणामय इच्छा हमारे निवेदन के बिना भी होती है , परन्तु हम इस बिनती में मांगते हैं, कि वह हमारे बीच में भी हो ।
                  यह कैसे होता है ? 
 ईश्वर सब बुरे विचारों और शैतान के सांसारिक अभिप्रायों और हमारी इच्छाओं को, जो हमें ईश्वर के नाम को पवित्र करने और उसके राज्य को हमारे पास पहुचने नहीं देते हैं, उनको रोकता और भंग करता है , वरन अपने
वचन और विश्वास में हमारे जीवन के अंत तक हमारी दृढ़ रक्षा करता है । यही उसकी उत्तम और करुणामय इच्छा है ।
        चौथी  बिनती 
  हमारी प्रतिदिन की रोटी आज हमको दे ।
          इसका क्या अर्थ है ? 
 ईश्वर प्रतिदिन की रोटी हम सभों को , वरन बुरे लोगों को भी उनके मांगने के बिना देता है । परन्तु हम इस निवेदन में मांगते हैं कि वह हमें इस कृपा को जनाए और हमारी प्रतिदिन की रोटी धन्यवाद सहित ग्रहण करने दे ।
       
       प्रतिदिन की रोटी का क्या अर्थ है ? 
 इसका यह अर्थ है की सब कुछ जो हमारे प्रतिपालन के लिए आवश्यक है ,उसकी पूर्ति ईश्वर की ओर से होती है अर्थात् खाना-पीना , ओढ़ना-बिछौना , घर-द्वार , खेत-मवेशी, चीज-वस्तु, धन-संपत्ति, भक्त स्त्री-पुरुष , भक्त बच्चे , भक्त दास-दासी, भक्त और विश्वस्त शासक, राज्य की सुदशा, सुखदायक ऋतु , देश का कुशल चैन , आरोग्यता ,सुव्यवहार, मान, मर्यादा , सच्चे मित्र, विश्वस्त पड़ोसी, इत्यादि ।


           पांचवीं बिनती 
          और हमारे अपराधों को क्षमा कर, जैसे हम भी अपने अपराधिओं को क्षमा करते हैं ।
               इसका क्या अर्थ है ? 
  हम इस निवेदन में मांगते हैं, कि स्वर्गवासी पिता हमारे पापों पर दृष्टी ना करें और उसके कारण हमारी बिनती को अनसुनी ना करे, कयोंकि हम जो कुछ मांगते हैं , उसके योग्य हम नहीं ठहारते हैं । जौभी कि हम प्रतिदिन अनेक पाप करते और केवल दण्ड ही कमाते हैं , परन्तु वह हमको अपने अनुग्रह और भलाई में सब कुछ दे ऐसा निवेदन करते हैं ।
   हम भी मन से उनको क्षमा करेंगे, जो हमारे प्रति अपराध करते हैं और बुराई के बदले आनंद से भलाई करेंगे ।                           
             छटवीं   बिनती 
       और हमको परीक्षा में मत डाल । 
                 इसका क्या अर्थ है ? 
  ईश्वर तो किसी की परीक्षा नहीं करता है , परन्तु हम इस निवेदन में मांगते हैं, की वह आप हमारी रक्षा करके हमको संभाले , की शैतान, संसार और हमारा शरीर हमको ना ठगे, ना मिथ्या विश्वास, संदेह और निराशा में गिराए और दूसरे कठिन कुकर्म और बुराई में ना डाले , और हम ऐसी परीक्षाओं से  कितना ही व्याकुल  किये जाएँ तौभी ना गिर पड़ें, परन्तु अंत में जय प्राप्त करें ।
         
         सातवीं बिनती 
              परन्तु बुरे से छुड़ा । 
              इसका क्या अर्थ है ? 
  हम इस निवेदन में सब बिनतीयाँ मिला कर मांगते हैं , की हमारा स्वर्गवासी पिता हमको देह और प्राण, धन-संपत्ति और मर्यादा को सब हानी और जोखिम से बचाए और अन्त में जब मरने की घड़ी पहुंचे, तब धन्य मृत्यु प्रदान करे  और हमको अपने दयापूर्ण उपकार के द्वारा इस दुःख सागर से पार करके अपने पास स्वर्ग में ग्रहण करे ।

          आठवीं बिनती 
       कयोंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे हैं, आमीन । 
                  आमीन । 
                  इसका क्या अर्थ है ? 
  हमको निश्चय हो कि ऐसी बिन्तियाँ हमारे स्वर्गवासी पिता के आगे ग्रह्वा होती हैं, कयोंकि उसने आप ही हमको आज्ञा दी है की हम इस प्रकार से मांगें और उसने सुनने की प्रतिज्ञा की है । आमीन, आमीन अर्थात सच, नि:संदेह ऐसा ही होगा ।

भाग -1

               खण्ड 4 
               बपतिस्मा  का सक्रामेन्त  
                  पहला
              बपतिस्मा क्या है ? 
 बपतिस्मा केवल साधारण जल नहीं, परन्तु ईश्वर की आज्ञा और वचन से जोड़ा और मिलाया हुआ जल है ।
              वह ईश्वर का कौन वचन है ?
     वही वचन है , जो हमारा प्रभु यीशु ख्रिस्त मत्ती 28:19 में कहता है , की तुम जाओ और सब जातियों के लोगों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता , पुत्र , और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो ।

                   दूसरा
        बपतिस्मा क्या फल देता है ? 
 वह पापों की क्षमा करता , मृत्यु और शैतान से छुड़ाता और हरएक को, जो ईश्वर के वचन और प्रतिज्ञा पर विश्वास करता है, अनंत सुख देता है  । 
             
          ईश्वर का वचन और प्रतिज्ञा क्या है ?
    वही है , जो हमारा प्रभु यीशु मार्क के 16:16 में कहता है, की जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले सो त्राण पयेगा, परन्तु जो विश्वास न करे, सो दण्ड के योग्य ठहराया जाएगा  ।

                तीसरा
     जल क्यों कर ऐसे बड़े कार्य कर सकता है ? 

    जल तो ऐसे बड़े कार्य नहीं करता है, परन्तु ईश्वर का वचन जो जल से मिला और उससे लगा हुआ है और विश्वास, जो जल से मिले हुए ईश्वर के वचन पर प्रतीति रखता है, प्रभाव लाता है । क्योंकि ईश्वर के वचन के बिना जल केवल साधारण जल होकर बपतिस्मा नहीं है, परन्तु ईश्वर के वचन के संग वह बपतिस्मा है । अर्थात्  दया और जीवन का त्राणकारी जल और पवित्र आत्मा के द्वारा नए जन्म का स्नान  ।
        जैसे पौलुस,तीतुस के 3:5 में कहता है कि नये जन्म के स्नान में पवित्र आत्मा को उसने हमारे त्राणकर्ता यीशु ख्रिस्त के द्वारा हम पर अधिकाई से उंडेला । इसलिए की हम उसके अनुग्रह से धर्मी ठहराए जाके अनंत जीवन की आशा के अनुशार अधिकारी बन जाएं , यह वचन विश्वास योग्य है ।

                   चौथा
          परन्तु ऐसे जलाभिषेक का क्या अर्थ है ?
            उसका यह अर्थ है , की पुराना आदम जो अब तक हम में है , प्रतिदिन के पश्चाताप और मन फिरने से डुबाया जाकर सब पाप और कुअभिलाषा सहित मरे और दिन-दिन नया मनुष्य निकलता और पुनजीवित होता रहे,      जो धर्म और पवित्रता से सदालों ईश्वर के सम्मुख  जिएँ  ।
                   यह कहाँ लिखा है ? 
   पौलुस रोमियों के 6:4 में कहता है की उसके मृत्यु का बपतिस्मा लेने से हम उसके संग गाड़े गये, की जैसे ख्रिस्त पिता के ऐश्वर्य से मृतकों में से उठाया गया,वैसे हम भी जीवन की सी नई चल चलें  ।

भाग -1

  खण्ड 5 
      प्रभु भोज अथवा बेदी का सक्रामेन्त  
        बेदी का सक्रामेन्त क्या है ?
  बेदी का सक्रामेन्त हमारे प्रभु यीशु ख्रिस्त की सच देह और सच लोहू है, जो रोटी और दाखरस में हम ख्रिस्तियों के खाने और पीने के लिए ख्रिस्त ही से ठहराया गया है  ।
                   यह कहाँ लिखा है ? 
         सुसमाचार संत मत्ती (26:26 ), मरकुस (14:22),लुका (22:19),और पौलुस (1 कोरिन्थ 11:23) यों लिखते हैं, "हमारे प्रभु यीशु ख्रिस्त ने जिस रात वह पकड़वाया गया, उसी रात को रोटी ली और धन्यवाद करके तोड़ी और अपने शिष्यों को दिया और कहा, लो खाओ, यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिए दी जाती है, मेरे स्मरण के लिए यह किया करो ।"
         इसी रीति से बियारी के पीछे कटोरा भी लेके धन्य माना और उसे उन्हें दिया और कहा, " लो तुम सब इसमें से पियो, यह मेरा लोहू अर्थात नये नियम का लोहू है ,जो तुम्हारे और बहुतों के पापमोक्षण के लिए बाहाया जाता है । जब-जब तुम इससे पियो तब-तब मेरे स्मरण के लिए यह किया करो ।"
                          ऐसे खान-पान से क्या मिलता है ? 
     इसका उत्तर हम को इस वचन से मिलता है, की-"तुम्हारे लिये दिया और पापमोक्षण के निमित्त बाहाया जाता है ।", अर्थात इस वचन के द्वारा हमको इस सक्रामेन्त में  पापमोक्षण, जीवन, धार्मिकता और त्राण मिलता है, क्योंकि जहाँ  पापमोक्षण है, वहां जीवन और त्राण भी है ।
 
             इस शारीरिक खान-पान से क्योंकर बड़े कार्य हो सकते हैं ?
  नि;संदेह खान-पान तो ऐसा नहीं करता है, परन्तु यह वचन जो लिखा गया है की- "तुम्हारे लिए दिया और पापमोक्षण के निमित्त बाहाया जाता है " यह वचन शारीरिक खान-पान सहित इस सक्रामेन्त का सिर और सार है और इस   वचन के विश्वासी को वह प्राप्त होता है ,जो कहा और बताया जाता है, अर्थात पापों की क्षमा ।

  सक्रामेन्त ग्रहण करने के योग्य कौन हो सकता है ? 
      उपवास और शारीरिक तैयारी इत्यादि करना तो अच्छे बाहरी साधन है  । परन्तु वास्तव में योग्य और सुप्र्स्तुत वह है, जो इस वचन पर विश्वास करता है, की- "तुम्हारे लिये दिया और पापमोक्षण के निमित्त बहाया जाता है । "
          परन्तु जो इस वचन पर विश्वास नहीं करता अथवा संदेह रखता है, वह अयोग्य और अप्रस्तुत है, क्योंकि "तुम्हारे लिए" यह वचन ऐसा मन चाहता है जो विश्वास करता है । 

भाग -1

   खण्ड 6
                    पाप स्वीकार 
           पाप स्वीकार क्या है ?
      पाप स्वीकार में दो विषय है-पहला पाप मान लेना, दूसरा पुरोहित से ऐसे पाप क्षमा ग्रहण करना ,जैसे ईश्वर से ही पाप पापमोक्षण प्राप्त हुआ ।

         किन-किन पापों को स्वीकार करना चाहिये ?
  ईश्वर के सामने अपने को वरन् सब अज्ञात पापों को भी दोषी जानना चाहिए । हम प्रभु की प्रार्थना में कहते हैं, तथापि पुरोहित के सामने हमें केवल उन पापों को मान लेना उचित है, जो हम जानते और मन में अनुभव करते हैं  ।

         वे कौन-कौन हैं ?
    दस आज्ञाओं के अनुसार अपने जीवन की दशा परखें  । चाहे तू माता-पिता , पुत्र-पुत्री;  स्वामी, घरनी, दास हो, चाहे तू अनाज्ञाकारी, अविश्वस्त,आलसी हुआ हो, चाहे तूने वचन अथवा कर्म से किसी को दुःख दिया हो , चाहे किसी    की चोरी अथवा आलस और ढिलाई से हानी की हो ।
        कुंजिओं का अधिकार क्या है ? 
  यह मंडली का अद्भुत अधिकार है जिसको ख्रिस्त ने पृथ्वी पर की कलीसिया को दिया है की वह पापियों के पापों को क्षमा करे, परन्तु अपश्चतापियों के पापों को तब तक रख छोडे जब तक की वे पश्चताप ना करें  ।

        यह कहाँ लिखा है ?
    युहन्ना अपने मंगल समाचार के २०वे पर्ब के 22 वे पद में यों लिखता है की - "प्रभु यीशु ने फूंक दिया और अपने शिष्यों से कहा, पवित्र आत्मा लो, जिसके पाप तुम क्षमा करो वे उनके लिए क्षमा किये जाते हैं जिनके तुम रखो वे     रखे हुए हैं ।"

      इस वचन को सुनकर तुम क्या विश्वास करते हो ?

   हम विश्वास करते हैं की जब ख्रिस्त के बुलाए गए सेवक उसकी ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार हमसे जो व्यवहार करते हैं, विशेषकर जब वे खुले रूप से अपश्चतापि पापियों ( चाहे वह आम व्यक्ती हो अथवा पुरोहित) को ख्रिस्तीय  मंडली से निकलते और उनको अलग करते हैं और उन पश्चतापियों को उनके पापों से मुक्त करते हैं जो पश्चाताप कर सुधारना चाहते हैं; तो यह उचित और निर्विवाद है, मानों हमारा प्रिय प्रभु यीशु स्वंय ही हमसे ऐसा करता है  ।